दोस्तो आज एक ऐसी घटना आपको बताता हु एक राजा ऋषभ जी हुआ करते थे उनकी पाँच पुत्री हुआ करती है सभी शरारती, चंचल, प्रकृति, गोरवर्ण आकर्ति एवम हठी स्वभाव की थी एक दिन एक साधु महाराज भिक्षा मांगने राजा जी के घर आये राजा जी का दिल बहुत बड़ा था उन्हे अपनी बेटियों पर अभिमान था ऋषि महाराज से कहा की मेरी बेटी लाखो मे एक है और उनके लिए उनकी पसन्द का लड़का चुनने का पुरा हक है ऋषि महाराज ने कहाँ आप जैसे राजा को यह शोभा नही देता ! आपको उनकी पसंद का नही बल्कि अपने मुताबिक, एवम सही वर चुनाव करे तभी वह सुखी रह पायेगी तब राजाजी हस् पड़े कहने लगे मेरी बेटियों से कोन शादी नही करना चाहेगा हम राजा है हमारी बेटियों सुंदर है उन्हे अपनी पसन्द का चुनने का पूरा हक है लेकिन बात धन की है तो मेरे पास बहुत कुछ है मुझे धन की परवाह नही ! साधु महाराज भिक्षा लेकर निकल पड़े
समय बीतता गया राजा जी उम्र दराज होते चले गए बेटियों की उम्र भी ढलती जा रही थी उन्होंने वर चुनने का अधिकार अपनी बेटियों को दे रखा था लेकिन उनकी बेटियों वर का चुनाव ही नही कर पाई और उम्र सी बड़ती चली गयी अब राजाजी को ऋषि महाराज की वो बात आने लगी की बेटियों को वर चुनने का अधिकार मैने उन्हें स्वयम दे रखा था लेकिन बेटियों उनका चुनाव नही कर पायी उन्हे अपनी अपने पिता होने का कर्तव्य नही ज्ञात हुआ!
पुन्ह साधु महाराज भिक्षा मांगने राजा जी के यहा आये उनका ध्यान बेटियों पर गया और उन्होंने राजा जी से कहा आपकी बेटियां अभी तक कुवारी है वे अपने वर का चुनाव नही कर पायी तभी राजा जी ने कहा की मुझे आपकी बात इस तरह नही नजरंदाज करनी थी
मे अब समझ पा रहा हु की मुझे अपनी दोलत, सुंदर बेटियों पर घमंड था लेकिन पिता होने का कर्तव्य में नही समझ पाया आज मैने समझा बेटियों को बड़ा करना ही पिता का कर्तव्य नही बल्कि उनके लिए एक अच्छे वर का चुनाव कर परिवार को बड़ाना यह पिता का कर्तव्य है
तब राजा जी कहते है न धन, न लोभ, न रंग बल्कि एक पिता वही है जो समय के मुताबिक
बेटियों को बिदा करे असली कर्तव्य वही है इसे पराया नही कहे ये
बेटियां अनमोल है उन्हे विदाई करना बड़े सौभाग्य की बात है जो अपने घर का परिवार को बड़ाती है और हमे जीने का सहारा देती है यह जीवन है एवम एक सच्चे पिता का अभिमान है की वह जहाँ जाए उसे हर वो खुशी मिले जो मैने उसे दी है यह सुंदरता है
https://youtu.be/fKM_YFE9X7M
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